पाबंदियों से आज़ादी

आशा तीन बहनो मे सबसे छोटी थी और अपने मम्मी पापा के बहोत क़रीब थी… बड़ी दोनों बहनो ने तो कबका अपना घर बसा लिया था लेकिन आशा अपने पैरो पे खड़ा होके अपने माँ बाप का बेटा बनना चाहती थी.. उसी वजह से उसकी शादी की उम्र भी निकल रही थी… वैसे तो वो परिवार वालो के सामने खिलखिलाती थी लेकिन कभी कभी खुदको अकेला पाती.. उसके माँ पापा ने आशा को बुलाया और अपना घर बसाने को कहा… आशा उन्हें छोड़ने को तैयार नही थी लेकिन अपने पापा की ज़िद के आगे उसकी नहीं चली और वो शादी करने के लिए राज़ी हो गई… उसका रिश्ता रिषभ के साथ तय हुआ.. रिषभ की फॅमिली मे सिर्फ वो और उसकी माँ ही थे.. उसकी बहन की शादी उसी शहर मे हुई थी…  छोटा और सुखी कुटुंब है ये सोचकर आशा के पापा मम्मी बहोत ख़ुश थे… आशा और रिषभ भी एकदूसरे को पसंद थे… सगाई के एक महीने बाद ही शादी थी.. आशा जब भी अपने होनेवाले ससुराल आती तब रिषभ की माँ उसके तारीफों के पुल बांधती.. 

“बेटी जब तु इस घर आएगी ना तब हम माँ बेटी साथ मे घूमेंगे,  घर को तुम्हारी पसंद के हिसाब से सजायेंगे… और हा अपने मम्मी पापा को कहना हमें दहेज मे कुछ नहीं चाहिए.. तुम यहाँ आके अपनी नौकरी भी कर सकती हो…मेरी एक बेटी ससुराल गई तो दूजी आए गई  “

ये सब सुन आशा बहोत ख़ुश हुई.. उसे लगा उसे जैसा चाहिए वैसा ही ससुराल मिला है.. वो अपने मम्मी पापा को दहेज का बोज़ नहीं देना चाहती थी और बिलकुल वैसा ही हुआ… 

रिषभ भी आशा से हररोज़ बातें करता और उसको नए नए सपनो की दुनिया मे ले जाता था… आशा उसी सपनो के साथ अपने माँ  बाप को छोड़ शादी करके ससुराल आई..  पहले एक महीना तो सब ठीक चला.. रिषभ सब को बड़े रौब से आशा को मिलवाता… अच्छी खासी रिसेप्शन पार्टी भी रखी.. दोनों हनीमून पे भी गए… अब आशा की छुट्टियां खत्म हो गई थी…और उसको ऑफिस ज्वाइन करना था… ऑफिस के पहले दीन तो उसकी सास ने खुद टिफ़िन बनाके आशा को दिया.. 

“अरे मम्मी जी,  मे कर लेती ना? “

“नहीं बेटा,  ऑफिस जाने मे देर हो जाती ना फीर.. रात को देर से जो सोइ थी.. “

“थैंक यू मम्मी जी “

एक महीने तक उसकी सास आशा के मना करने के बावजूद उसके लिए टिफ़िन बनाती…आशा भी ऑफिस जाने से पहले घर के काम मे मदद करती और ऑफिस से आके सबका खाना पकाती… उसकी ननद भी पास मे ही रेहती तो लगभग हररोज़ शाम के खाने के वक़्त वो अपने बच्चों के साथ मायके मे आ जाती.. आशा की ननद अपने पति और दो बेटियो  के साथ अलग रेहती थी और आशा के ऑफिस से वापिस आते ही वो खुद भी आ जाती और अपनी माँ के साथ गप्पे लड़ाती.. 

“मेरी दोनों बेटियों को तो सिर्फ मामी के हाथ का खाना पसंद आता है अबतो.. बताओ वो सिर्फ आशा के साथ ही खेलना चाहती है.. इसीलिए ऱोज़ आ जाती हु माँ… भाभी को बुरा तो नहीं लगेगा ना?”

“अरे नहीं उसको क्यों बुरा लगेगा..पहले ये तेरा घर है.. वो तो अभी अभी आई है… बच्चियों को जो भी खाना है बोलदे आशा को बना देगी वो… “

आशा सुबह से शाम नौकरी करती और शाम को इन सब की खातिरदारी… रात को रिषभ काम से वापिस आते उससे पहले ही उसकी आँख लग जाती… तभी रिषभ की माँ ने अपना असली रूप दिखाना शुरु किया… आशा रिषभ का खाना टेबल पे लगाके जैसे ही अपने कमरे मे गई.. डोर बेल बजी.. रिषभ की माँ ने दरवाज़ा खोला.. और रिषभ को खाना परोसा..

“आशा कहा गई माँ? “

“बहु तो थक जाती है बहोत,  बिचारी कुछ काम कर ही नहीं पाती अपनी नौकरी के रेहते… तेरी बहन ऱोज़ आके सबका खाना पकाती है… वर्ना मेरी ऐसी उम्र कहा जो मैं इतनी देर तक रसोई मे खड़ी रेह पाऊ…” 

रिषभ खाते खाते उठ गया और कुछ नहीं बोला.. 

दूसरे दीन जब आशा अपना टिफ़िन बनाके जा रही थी.. तभी रिषभ उठके बाहर आया.. 

“आशा तुम आज की छुट्टी लेलो.. आज माँ की मदद करदो..माँ की तबियत ठीक नहीं है… माँ आज आराम करेगी.. “

“लेकिन ऐसे बिना बताये कैसे लेलु  छुट्टी? मैं सारा काम खत्म करके थोड़ी देर से जाउंगी.. मम्मी जी को खाना खिलाके फीर जाउंगी” रिषभ कुछ नहीं बोला… जैसे ही आशा का काम खत्म हुआ और वो जाने की तैयारी कर रही थी तभी उसकी ननद,  उसकी सहेली और बेटियों के साथ आई.. 

“अरे भाभी अच्छा हुआ आप घर पे हो.. मैने माँ को फ़ोन किया था उनकी तबियत ठीक नहीं है… ये मेरी सहेली उनको पैर का मसाज देने आई है… एक घंटा लगेगा.. देखिए ना इन सब की भागा दौड़ी मे हमने नाश्ता भी नहीं किया और आपको देख के अभी ये लोग मेरे हाथ का कुछ खाने से तो रहे…कुछ अच्छा सा बना दीजिए ना… ” अब आशा को छुट्टी लेना तय था… अब ये हररोज़ होने लगा.. कभी मम्मीजी की तबियत,  ननद और बच्चीओ का आना, कभी हॉस्पिटल जाना,  कभी बुआजी का आना..कभी सिर्फ रिषभ के कहने से…  आशा को ऑफिस से भी ताने सुनने पड़ते थे… और काम का बोज़ भी बढ़ गया था… आज रिषभ को देर से जाना था उसी मौके का फायदा उठाते हुए.. उसकी माँ ने बोला, 

“तेरी बीवी इतना पैसा कमाती है.. लेकिन घर मे तो आधी सैलरी ही देती है… बाकी का क्या करती है… अपने माँ बाप को तो नहीं देती ना.. देख लेना बेटा..  बहु दहेज तो कुछ नहीं लाई,  ऊपर से उसके खाने पीने रहने के खर्चे हम उठाये और वो पैसा मायके मे खर्च करती है तो उसको रोक ले “ऱोज़ की इन बातो को सुन  रिषभ को बहोत गुस्सा आया वो बिना कोई सच को जाने आशा पे टूट पडा… आशा को दहेज से लेके  पैसे कहा उड़ाती है,  घर पे कुछ काम नहीं करती है… अपनी मर्ज़ी से जीती है… उसकी सास की परवा नहीं करती… नौकरी छोड़ घर पे बैठ और ना जाने कितनी बातें सुनाई.. आशा ने सिर्फ इतना कहा की ना तो मैं पैसे अपने माँ पापा को देती हु और ना ही फ़िज़ूलखर्च करती हु… मैने हमारे भविष्य के लिए कुछ पैसे जोड़ने के लिए उसकी हर महीने की डिपाजिट करवाई है… फीर भी रिषभ और उसकी माँ को यकीन नहीं आया… और उन्होंने आशाके द्वारा किए गए एक एक रूपये के खर्च का हिसाब रखना शुरु किया…उसकी जो भी सेविंग्स थी वो डिपाजिट के पेपर अपनी सास के हाथ मे रख दिए…  यहाँ तक की वो क्या पहनेगी क्या नहीं,  कितने बजे आयेगी, आशा के पैसो से लाए  हुए स्कूटर मे पेट्रोल भी आशा को ही डलवाना होगा और अपनी पुरी सैलरी उसकी सास को देनी होगी और खर्च के पैसे उनसे ही लेने होंगे… आशा के चेहरे का नूर ही जैसे चला गया था.. और उसकी सास अपने निम्न स्तर पे जा पहुची थी… वो नहीं जानती थी की वो अपने ही बेटे की गृहस्थी को उझाड़ रही थी… आशा को सगाई के बाद का वक़्त और अपनी सास और पति का नकली चेहरा और शादी के बाद के छे ही महीनों मे उनका असली चेहरा दिख गया था… इससे पहले की वो लोग आशा को कोई ग़लत कदम उठाने पर मजबूर करे, पढ़ी लिखी आशा, अपने माँ बाप का बेटा बनके रहने वाली आशा, डिवोर्स पेपर पर सिग्नेचर कर के, उनलोगो के कभी ना पुरे होने वाले मंसूबों को ठोकर मार के, जो कभी उसका ना हुआ वैसे ससुराल से कोई आशा ना रख के, अपने आप पे लगी सारी पाबंदीओ को तोड़ के चली गई……. 

monabhatt द्वारा प्रकाशित

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