शोभा काफ़ी बहिर्मुखी थी,अपने विचारों को लेकर पक्की भी और अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीने वाली… और वही सपना एक सेहमी सी, बहुत कम बात करने वाली, और सबका मन रखने वाली.. वो कभी अपने विचारों को जताती न थी,जो सब कहे वही ठीक, उसने अपनी इच्छाओ को कभी किसीको नहीं बताया.. पता नहीं इतनी अलग अलग होने के बावजूद भी वे दोनों पक्की सहेलियां थी, स्कूल के समय से..और उन दोनों का ससुराल भी एक ही शहर में था.. सपना मार्केट में सब्ज़ी ले रही थी, तभी सामने शोभा को देखा, “अरे, तुम यहाँ? कैसी हो? ” सपना शोभा को देखके खुश हो गई..” अच्छी हु, यहाँ मार्केट के पास डॉक्टर पुजा की हॉस्पिटल है तो उनको इनविटेशन देने आई थी, अगला नंबर तुम्हारा ही था सपना. में तुम्हे इस महिला दिन होने वाले हमारे महिला आयोग के फंक्शन में निमंत्रित करती हु”, शोभा बोली. सपना हाउस वाइफ होने की वजह से मन से खुदको छोटा ही समझती, और वो उस फंक्शन में जाने के लिए भी तैयार ना थी उसने जाने से मना कर दिया, “मे नहीं आ सकती, क्या करूँगी मे वहा पर, और मे तो किसीको जानती भी नहीं “, ” मुझे तो जानती हो ना ! बस इतना काफ़ी है ” शोभा बोली..” फीर भी अगर तुझे आने मे जिजक हो रही है तो बोल दे मे जीजू से बात कर लेती हु, और तेरे सास ससुर से भी”. सपना थोड़ा हिचकिचाई और बोली, “नहीं नहीं, मे बात कर लुंगी और कितने बजे जाना है वो बता देना, मे घर वालो की रसोई और काम जल्दी से निपटा कर आ जाउंगी ” शोभा को थोड़ा गुस्सा आया,” क्या एक टाइम का खाना तू नहीं पकाएगी तो नहीं चलेगा? कब तू रोज़ रोज़ बाहर जाती है, ऑनलाइन फ़ूड ऑर्डर कर देना या फीर वो पड़ोस की होटेल से मँगवाले, जो चाहिए वो मिलेगा”. “नहीं उन लोगो को बाहर का खाना पसंद नहीं है, कोई बात नहीं, में आजाऊंगी” इतना कहके सपना ने घर की तरफ चलना शुरू कर दिया, शोभा कुछ बोल ही ना पायी…
फंक्शन शुरू हो चूका था. सभी प्रोफेशन की महिलाये स्टेज पे थी, कोई बैंक मैनेजर तो कोई पुलिस अधिकारी, कोई कॉलेज की प्रोफेसर, तो कोई डॉक्टर… महिला दिवस के इस फंक्शन में शोभा भी मंच पे बिराजमान थी, वो महिलाओ के समान अधिकारों के लिए काम करती एक NGO की संस्थापक थी.. सभी महिलाओ को अपनी स्पीच देनी थी. शोभा बार बार दरवाजे की तरफ देख रही थी, सपना के आने का इंतजार कर रही थी. सपना के घर की हालत पता थी उसे, वैसे वो खास आती जाती नहीं थी सपना के वहा, लेकिन सिर्फ एक बार जाके ही शोभा को पता चल गया था की सपना के ससुराल वाले काफ़ी घमंडी, लालची और मतलब से ही बात करने वाले लोग थे, उनको सपना के मायके से आया कोई भी इंसान अच्छा नहीं लगता था, सपना इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद उनके सामने कुछ बोल ही नहीं पाती थी और शोभा उससे कुछ केहती तो वो “सब ठीक है “कह के हमेशा बात को टाल देती. शोभा से अपनी सहेली की ये हालत देखी नहीं जा रही थी, उसने सपना को खिलके मुस्कुराते हुए देखे मानो सालों हो चुके थे..सिर्फ सपना की वजह से शोभा चुप बैठी थी. लेकिन आज शोभा ने तय किया था के वो स्टेज पे सपना का नाम लिए बगैर, उसके जैसी महिलाओ को प्रोत्साहित करनेवाली स्पीच देगी. अभी शोभा की ही बारी थी महिला दिन के विषय में बात करने की, तभी हॉल मे सपना दाखिल हुई, धीमी चाल से अंदर आई, देर से आई थी और कार्यक्रम में किसीको खलेल ना पहोचे इसलिए वो नज़दीक की ही सीट पे बैठ गई.. पूरा हॉल महिलाओ से खचाखच भरा था.. सपना अपनी शादी के बाद अकेले किसी प्रोग्राम में पहली बार बहार गई थी. शोभा जैसे ही खड़ी हुई, सब तालिया बजा ने लगे.. शोभा ने सभी महिलाओ को एक बार अपने खुदके लिए तालिया बजाने को कहा, और बोलने शुरुआत की, “में सभी महिलाओ को अपने लिए मनाये जाने वाले इस दिन की बधाई देती हु. महिला, औरत, लड़की जो भी कह लीजिए, सबसे पहले हमें भगवान के दिए इस अवतार को ख़ुशी से accept करना चाहिए. क्योंकि हम मै ही है वो ताकत,वो जज़्बा, वो हिम्मत, वो धैर्य और वो सहनशीलता जो पथ्थरो को भी पिग्ला देती है… और उसीकी वजह से जीवन में आए किसी भी बदलाव को हम सहजता से अपना लेते है और उसमे ढल भी जाती है.. फीर वो छोटी बच्ची से जवान लड़की का बदलाव हो, लड़की से लेके एक शादी शुदा औरत का बदलाव हो या फीर औरत से माँ बनने का बदलाव.. इन बदलावों के दरमियान कई सारे अलग अलग रिश्ते भी निभाना हम खूब जानती है.. बस उसी बदलाव भरी हमारी जिंदगी में हम खुदको ही भूल जाती है, अपनी इच्छाओ को परिवार के लिए, कभी बच्चों के लिए मार देती है , खुदको ही ना मिलने का, अपनी अंदर ही कैद उस आशा के पंछी को आज़ाद ना करने का मन बना लेती है.. क्यों??? क्यों ऐसा करती है हम, इतनी ज़िम्मेदारीया, इतने रिश्ते, अपनी जॉब, बच्चे सब सँभालना इन सब का गर्व होना चाहिए हमें..
में महिला और पुरुष की बराबरी की बात नहीं करुँगी, हमें जीवन को सारी ज़िम्मेदारीयों के बोझ से आगे भी सोचना चाहिए.. में नहीं केहती के चूल्हा चौका मत करो, अपने घरवालों का ध्यान मत रखो.. सब करो लेकिन सबको साथ लेकर करो..अपनी इच्छाओ को ऐसे ही बुझने ना दो..समय निकालो उस महान हस्ती से मिलने के लिए जो तुम्हारे अंदर है, अपनी प्रतिभा को कम मत समझो, घर का काम manage करना वो भी किसी कंपनी के मैनेजर से कम नहीं है, वो तो सिर्फ आठ घंटे देता है, आप तो पूरे दिन रात देती है…
घर के लोगो से सपोर्ट लो,पति,देवर, ननद, और थोड़ा सा खुदका काम सास ससुर कर लेंगे तो कितनी आसानी होंगी ना! उस बचे हुए समय को आप अपने परिवार के साथ ख़ुशी के पल बिता ने के लिए या अपने शोख पुरे करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.. और हम 21st century की लड़किया है, बहुएँ है, बेटियां है, और माँए भी.. अपने माँता पिता को भी यही समजाये, और अपने बच्चों को भी, के कैसे खुदके काम खुद करने है.. उसकी ट्रेनिंग दीजिए… मज़े से उनको घर के कामो में involve कीजिए.. फीर देखिए, ना तो समय की कमी होंगी, ना आत्म विश्वास की और ना ही वो अंदर का पंछी पिंजरे में रहेगा.. वो पंछी अपनी आशाओ के आसमान में आज़ाद होके उड़ेगा और दुनिया देखेगी आपको, और आप खुद भी गर्व करेगी अपने आप पे ” कहते हुए शोभा ने अपनी स्पीच पूरी की.. और हॉल की सारी महिलाए खड़ी होकर तालियां बजाने लगी… सपना भी जैसे खो ही गई थी उसकी बातो में… जैसे ही शोभा सब का अभिवादन ले रही थी, सपना उसके पास जा पहोची और सबके बिच उसको गले लगा लिया, “thank you शोभा ” बोल कर बाहर निकलने लगी…. इधर शोभा भी बहोत खुश थी,उसने जैसा सोचा वैसा ही हुआ…
आज हॉल के बाहर निकलती हुई सपना कुछ ओर ही थी.. उसने भी अपने जीवन को ख़ुशी से बिताने का दृढ़ निश्चय किया और आत्म विश्वास से भरी हुई सपना ने पहला कदम रखा, अपना जीवन सही तरीके से जीने लिए.. …
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