Be yourself; Everyone else is already taken.
— Oscar Wilde.
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It relates to all age group women… From a girl to an old age woman….
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आशा तीन बहनो मे सबसे छोटी थी और अपने मम्मी पापा के बहोत क़रीब थी… बड़ी दोनों बहनो ने तो कबका अपना घर बसा लिया था लेकिन आशा अपने पैरो पे खड़ा होके अपने माँ बाप का बेटा बनना चाहती थी.. उसी वजह से उसकी शादी की उम्र भी निकल रही थी… वैसे तो वो परिवार वालो के सामने खिलखिलाती थी लेकिन कभी कभी खुदको अकेला पाती.. उसके माँ पापा ने आशा को बुलाया और अपना घर बसाने को कहा… आशा उन्हें छोड़ने को तैयार नही थी लेकिन अपने पापा की ज़िद के आगे उसकी नहीं चली और वो शादी करने के लिए राज़ी हो गई… उसका रिश्ता रिषभ के साथ तय हुआ.. रिषभ की फॅमिली मे सिर्फ वो और उसकी माँ ही थे.. उसकी बहन की शादी उसी शहर मे हुई थी… छोटा और सुखी कुटुंब है ये सोचकर आशा के पापा मम्मी बहोत ख़ुश थे… आशा और रिषभ भी एकदूसरे को पसंद थे… सगाई के एक महीने बाद ही शादी थी.. आशा जब भी अपने होनेवाले ससुराल आती तब रिषभ की माँ उसके तारीफों के पुल बांधती..
“बेटी जब तु इस घर आएगी ना तब हम माँ बेटी साथ मे घूमेंगे, घर को तुम्हारी पसंद के हिसाब से सजायेंगे… और हा अपने मम्मी पापा को कहना हमें दहेज मे कुछ नहीं चाहिए.. तुम यहाँ आके अपनी नौकरी भी कर सकती हो…मेरी एक बेटी ससुराल गई तो दूजी आए गई “
ये सब सुन आशा बहोत ख़ुश हुई.. उसे लगा उसे जैसा चाहिए वैसा ही ससुराल मिला है.. वो अपने मम्मी पापा को दहेज का बोज़ नहीं देना चाहती थी और बिलकुल वैसा ही हुआ…
रिषभ भी आशा से हररोज़ बातें करता और उसको नए नए सपनो की दुनिया मे ले जाता था… आशा उसी सपनो के साथ अपने माँ बाप को छोड़ शादी करके ससुराल आई.. पहले एक महीना तो सब ठीक चला.. रिषभ सब को बड़े रौब से आशा को मिलवाता… अच्छी खासी रिसेप्शन पार्टी भी रखी.. दोनों हनीमून पे भी गए… अब आशा की छुट्टियां खत्म हो गई थी…और उसको ऑफिस ज्वाइन करना था… ऑफिस के पहले दीन तो उसकी सास ने खुद टिफ़िन बनाके आशा को दिया..
“अरे मम्मी जी, मे कर लेती ना? “
“नहीं बेटा, ऑफिस जाने मे देर हो जाती ना फीर.. रात को देर से जो सोइ थी.. “
“थैंक यू मम्मी जी “
एक महीने तक उसकी सास आशा के मना करने के बावजूद उसके लिए टिफ़िन बनाती…आशा भी ऑफिस जाने से पहले घर के काम मे मदद करती और ऑफिस से आके सबका खाना पकाती… उसकी ननद भी पास मे ही रेहती तो लगभग हररोज़ शाम के खाने के वक़्त वो अपने बच्चों के साथ मायके मे आ जाती.. आशा की ननद अपने पति और दो बेटियो के साथ अलग रेहती थी और आशा के ऑफिस से वापिस आते ही वो खुद भी आ जाती और अपनी माँ के साथ गप्पे लड़ाती..
“मेरी दोनों बेटियों को तो सिर्फ मामी के हाथ का खाना पसंद आता है अबतो.. बताओ वो सिर्फ आशा के साथ ही खेलना चाहती है.. इसीलिए ऱोज़ आ जाती हु माँ… भाभी को बुरा तो नहीं लगेगा ना?”
“अरे नहीं उसको क्यों बुरा लगेगा..पहले ये तेरा घर है.. वो तो अभी अभी आई है… बच्चियों को जो भी खाना है बोलदे आशा को बना देगी वो… “
आशा सुबह से शाम नौकरी करती और शाम को इन सब की खातिरदारी… रात को रिषभ काम से वापिस आते उससे पहले ही उसकी आँख लग जाती… तभी रिषभ की माँ ने अपना असली रूप दिखाना शुरु किया… आशा रिषभ का खाना टेबल पे लगाके जैसे ही अपने कमरे मे गई.. डोर बेल बजी.. रिषभ की माँ ने दरवाज़ा खोला.. और रिषभ को खाना परोसा..
“आशा कहा गई माँ? “
“बहु तो थक जाती है बहोत, बिचारी कुछ काम कर ही नहीं पाती अपनी नौकरी के रेहते… तेरी बहन ऱोज़ आके सबका खाना पकाती है… वर्ना मेरी ऐसी उम्र कहा जो मैं इतनी देर तक रसोई मे खड़ी रेह पाऊ…”
रिषभ खाते खाते उठ गया और कुछ नहीं बोला..
दूसरे दीन जब आशा अपना टिफ़िन बनाके जा रही थी.. तभी रिषभ उठके बाहर आया..
“आशा तुम आज की छुट्टी लेलो.. आज माँ की मदद करदो..माँ की तबियत ठीक नहीं है… माँ आज आराम करेगी.. “
“लेकिन ऐसे बिना बताये कैसे लेलु छुट्टी? मैं सारा काम खत्म करके थोड़ी देर से जाउंगी.. मम्मी जी को खाना खिलाके फीर जाउंगी” रिषभ कुछ नहीं बोला… जैसे ही आशा का काम खत्म हुआ और वो जाने की तैयारी कर रही थी तभी उसकी ननद, उसकी सहेली और बेटियों के साथ आई..
“अरे भाभी अच्छा हुआ आप घर पे हो.. मैने माँ को फ़ोन किया था उनकी तबियत ठीक नहीं है… ये मेरी सहेली उनको पैर का मसाज देने आई है… एक घंटा लगेगा.. देखिए ना इन सब की भागा दौड़ी मे हमने नाश्ता भी नहीं किया और आपको देख के अभी ये लोग मेरे हाथ का कुछ खाने से तो रहे…कुछ अच्छा सा बना दीजिए ना… ” अब आशा को छुट्टी लेना तय था… अब ये हररोज़ होने लगा.. कभी मम्मीजी की तबियत, ननद और बच्चीओ का आना, कभी हॉस्पिटल जाना, कभी बुआजी का आना..कभी सिर्फ रिषभ के कहने से… आशा को ऑफिस से भी ताने सुनने पड़ते थे… और काम का बोज़ भी बढ़ गया था… आज रिषभ को देर से जाना था उसी मौके का फायदा उठाते हुए.. उसकी माँ ने बोला,
“तेरी बीवी इतना पैसा कमाती है.. लेकिन घर मे तो आधी सैलरी ही देती है… बाकी का क्या करती है… अपने माँ बाप को तो नहीं देती ना.. देख लेना बेटा.. बहु दहेज तो कुछ नहीं लाई, ऊपर से उसके खाने पीने रहने के खर्चे हम उठाये और वो पैसा मायके मे खर्च करती है तो उसको रोक ले “ऱोज़ की इन बातो को सुन रिषभ को बहोत गुस्सा आया वो बिना कोई सच को जाने आशा पे टूट पडा… आशा को दहेज से लेके पैसे कहा उड़ाती है, घर पे कुछ काम नहीं करती है… अपनी मर्ज़ी से जीती है… उसकी सास की परवा नहीं करती… नौकरी छोड़ घर पे बैठ और ना जाने कितनी बातें सुनाई.. आशा ने सिर्फ इतना कहा की ना तो मैं पैसे अपने माँ पापा को देती हु और ना ही फ़िज़ूलखर्च करती हु… मैने हमारे भविष्य के लिए कुछ पैसे जोड़ने के लिए उसकी हर महीने की डिपाजिट करवाई है… फीर भी रिषभ और उसकी माँ को यकीन नहीं आया… और उन्होंने आशाके द्वारा किए गए एक एक रूपये के खर्च का हिसाब रखना शुरु किया…उसकी जो भी सेविंग्स थी वो डिपाजिट के पेपर अपनी सास के हाथ मे रख दिए… यहाँ तक की वो क्या पहनेगी क्या नहीं, कितने बजे आयेगी, आशा के पैसो से लाए हुए स्कूटर मे पेट्रोल भी आशा को ही डलवाना होगा और अपनी पुरी सैलरी उसकी सास को देनी होगी और खर्च के पैसे उनसे ही लेने होंगे… आशा के चेहरे का नूर ही जैसे चला गया था.. और उसकी सास अपने निम्न स्तर पे जा पहुची थी… वो नहीं जानती थी की वो अपने ही बेटे की गृहस्थी को उझाड़ रही थी… आशा को सगाई के बाद का वक़्त और अपनी सास और पति का नकली चेहरा और शादी के बाद के छे ही महीनों मे उनका असली चेहरा दिख गया था… इससे पहले की वो लोग आशा को कोई ग़लत कदम उठाने पर मजबूर करे, पढ़ी लिखी आशा, अपने माँ बाप का बेटा बनके रहने वाली आशा, डिवोर्स पेपर पर सिग्नेचर कर के, उनलोगो के कभी ना पुरे होने वाले मंसूबों को ठोकर मार के, जो कभी उसका ना हुआ वैसे ससुराल से कोई आशा ना रख के, अपने आप पे लगी सारी पाबंदीओ को तोड़ के चली गई…….
आज टीना ने खूब हिम्मत जुटाई, अपनी माँ को बोल ही दीया, और माँ भी जट से अपना सामान पैक करने लगी, वापिस जाने के लिए…… टीना एकलौती बेटी है रीमा और राजीव की, टीना राजीव के काफ़ी नज़दीक है,जैसे हर बेटी अपने पापा से होती है मगर रीमा हमेशा टीना का हद से ज़्यादा ही ध्यान रखती.. इकलौती जो थी.. टीना के बचपन से ही रीमा उसके आसपास ही रहती, बचपन मे तो बच्चे को माँ का प्यार चाहिए ही होता है और बच्चा सबसे नज़दिक माँ से ही होता है, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता जाता है, वो घरवालों के साथ रहने के अलावा, अपने फ्रेंड्स, अपनी पढ़ाई, अपने शोख पुरे करने में भी व्यस्त होते जाते है, उम्र के साथ साथ जिंदगी में बदलाव भी आते है … पर यहाँ टीना का किस्सा कुछ ओर ही था, टीना बचपन में तो अपनी मम्मी की लाडली थी ही, लेकिन समय बीतता गया और रीमा का प्यार, टीना की तरफ उसका लगाव बढ़ता ही चला गया.. टीना क्या पहनेगी, क्या खायेगी, कहा खेलेगी, कैसे खेलेगी, किसके साथ दोस्ती करेंगी, कौन सी स्कूल में जाएगी, कौन से कॉलेज मे जाएगी सबकुछ वही तय करती. राजीव को रीमा का यह स्वभाव बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. वो रीमा को हमेशा टोकता की बच्ची को कभी अपने मनकी तो कुछ करने दीया करो, तो रीमा बोलती, “आप अपने बिज़नेस को संभालिए, अभी बच्ची ही है वोह, उसे क्या पता क्या सही क्या गलत” तभी राजीव बोलता, “बीस सालो से यही सुनता आ रहा हु, अब तो उसे बड़ी होने दो ” लेकिन रीमा को राजीव की बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था वो बस अपनी बेटी के प्यार में जैसे अंधी सी हो गई थी. टीना भी जैसे मम्मी की आदि हो चुकी थी, पहले से ही उसने कोई फैसला अपनेआप नहीं किया था तो वो भी जैसे मम्मी के बगैर कुछ नहीं कर पाती थी.. कॉलेज मे आने के बाद रीमा कई बार टीना से मिलने कॉलेज जाती, कभी कबार तो वो टीना के फ्रेंड्स ने दी हुई पार्टी मे भी जाती.. टीना के फ्रेंड्स भी बोलते, ” टीना तेरी मम्मी भी ना, अब इस पार्टी में वो क्या करेंगी? टीना को कभी कभी अच्छा ना लगता की उसकी मम्मी हर जगह पहोच जाती थी और हर वक़्त फ़ोन करती के कहा है, क्या कर रही है ये जानने के लिए.. टीना अपनी बचपन की सहेली के यहाँ पढ़ने दूसरी बिल्डिंग में जाती तो भी रीमा खिड़की से जाक कर देखती, जब तक वो ना आती तब तक जगती… टीना मम्मी को बोलती इतना परेशान ना होनेके लिए लेकिन रीमा बोलती, “तू अभी बच्ची है, कुछ नहीं जानती और में तुजसे प्यार करती हु तेरी फ़िक्र करती हु इसीलिए ये सब करती हु ” टीना कुछ नहीं बोल पाती.. आज टीना की शादी हो चुकी है, जय के साथ, जय और टीना एक ही कॉलेज में पढ़ते थे और अब एक ही जगह नौकरी भी करते है… रीमा को टीना की जिंदगी में कोई आए और उससे ज़्यादा प्यार करने लगे, ये बात हज़म नहीं हो रही थी, क्योंकि इतने सालो में सिर्फ वही थी जो टीना के साथ परछाई की तरह रहती थी लेकिन अब जय भी है.. जय अच्छा और समझदार लड़का है, वो जानता था की टीना की मम्मी उससे बहोत प्यार करती है और थोडी possessive है टीना को लेकर… टीना को शादी के बाद घर जैसा ही लगे, अकेलापन ना हो इसलिए जय ने अपनी सास यानि टीना की मम्मी को कुछ दिन साथ रहने को कहा.. रीमा तो तैयार ही थी, तुरंत ही पहोच गई… टीना ने थोड़े दिनों की छुटटी ली हुई थी, नई शादी और नये घर को सँभालने के लिए, जय के पेरेंट्स तो अमेरिका रहते थे, इसलिए शादीके बाद वे लोग वापिस चले गए और जय को कम्पनी का फ्लैट मिला था तो उसको सजाने मे टीना लगी हुई थी.. टीना जय से बहोत प्यार करती है और घर सजाने में भी वो जय की पसंद का ख्याल रखती, टीना और उसकी मम्मी बाज़ार जाते शॉपिंग को तो टीना को कुछ अच्छा लगे तो वो तुरंत जय को फ़ोन करती और उसकी पसंद का लेती, सुबह उठकर वो जय को टिफ़िन बना देती, और उसकी पसंद के कपड़े जय के लिए निकालके रखती, जय भी टीना को बाहर डिनर पे, कभी शॉपिंग पे या कभी ऐसे ही लॉन्ग ड्राइव पर ले जाता.. कभी कभी रीमा भी जाती उनदोनो के साथ.. टीना के साथ रहके रीमा को लगने लगा जैसे टीना अपनी जिंदगी में ही डूबी हुई है, और उसका प्यार टीना को दिख ही नहीं रहा है.. जय को एक पांच दिनों की टूर में शहर से बाहर जाना था, उसे टीना को छोड़के जाना था इसलिए सोच रहा था की मना करदे, लेकिन रीमा बोली वो टीना के साथ रहेगी इसलिये जय बेफिक्र होके गया.. जैसे ही जय टूर पे गया, रीमा ने टीना को जय के बारे में अनाब शनाब बोलना शुऊ किया… टीना ने उनकी बातो पे बहोत ध्यान नहीं दीया, तभी रात को जय का फ़ोन आया, वो टीना को बहोत miss कर रहा था.. और टीना भी.. दूसरे दिन ज़ब टीना और जय फ़ोन पे बात कर रहे थे तभी रीमा ने कुछ ड्रामा करके फ़ोन की बात को रोक दीया, ऐसे ही वो या तो जय के या उसके परिवार के बारे में कुछ ना कुछ बोलकर टीना को भड़काती रही.. वो टीना को बोलती के जय का प्यार नाटक है, सिर्फ वही है जो टीना का सबसे ज़्यादा ध्यान रखती है.. आखिर एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उसने टीना को तलाक लेने की सलाह दी और कहा की जय उसके लायक नहीं है, उसे छोड़दे, टीना के पाँव के नीचे से ज़मीन हिल गई, अब वो जय को और अपनी मम्मी के पागलपन से भरे प्यार को समझ गई थी, और पेहली बार अपनी मम्मी को उसने आईना दिखाया, ” मम्मी, आज तक में तुम्हारे मुताबिक अपनी जिंदगी जीते आई हुँ , मुझे लगा तुम मुजसे इतना प्यार करती हो इसलिए मेरी भलाई के लिए ही सब केहती होंगी, तुम्हे दुःख ना पहोचे इसलिए मैंने वही किया जो तुमने कहा, जय तुम्हे अपनी माँ की तरह समझता है, और में अकेली ना हो जाऊ इसलिए उन्होंने तुम्हे यहाँ बुलाया, और तुम उसके खिलाफ ही बोल रही हो !! मैंने अपनी नई ज़िंदगी की अभी शुरुआत ही की है और आप उसे छीनना चाहती है और वो भी इसलिए क्योंकि कोई और भी है जो मुझे आप जैसा प्यार करता है… उसका प्यार आप जैसा नहीं है आपसे भी कई ज़्यादा है, क्योंकि उसने कभी आपको या आपके प्यार को ग़लत नहीं समजा..आज में एक बेटी होने के नाते आपसे केहती हु की आप हमारी जिंदगी में दखल ना दे,मेरे परिवार को में संभाल लुंगी मम्मी, और जय बहोत ही अच्छे इंसान है ये बात जान लीजिए और हमें ख़ुशी से अपनी जिंदगी जीने दे… आते रहिएगा मम्मी “
दोस्तों कभी कभी मम्मी पापा का हद से ज़्यादा प्यार और सलाहे बच्चो के जीवन को खोखला बना देती है.. बच्चों के ऊपर हरवक़्त हेलीकॉप्टर की तरह मंडराना अच्छी बात नहीं है. उनको नई सोच और पँख दीजिए,अपने आप उड़ने के लिए…..
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धन्यवाद !
आकाश और संध्या स्कूल के समय से एकदूसरे के बहोत अच्छे दोस्त थे… दोनों एक ही गांव के थे शायद इसलिए शहर मे पढ़ने आने के बाद वे दोनों एकदूसरे के साथ ज़्यादा मिलजुल गए थे.. क्योंकि शहर के होस्टेल मे जल्दी से दोस्त बनाना मुश्किल था.. तब से लेके अब तक जब की वो अपने कॉलेज के आखिरी साल मे है, दोनों एक ही स्कूल, कॉलेज और एक ही होस्टेल मे रेहते थे… इतने सालो मे उनके कई सारे दोस्त बने लेकिन उन दोनों की केमिस्ट्री ही कुछ ओर थी…
पूरे कॉलेज को मालूम हो चूका था की आकाश और संध्या made for each other वाली जोड़ी है… और वे दोनों भी समय के साथ कब पक्के दोस्त से सच्चे प्रेमी बन गए वो खुद भी नहीं जानते थे… संध्या उच्च विचारों वाली, समझदार और गांव के प्रतिष्ठित परिवार लड़की है और आकाश भी गांव के एक अच्छे फॅमिली से था..जब भी स्कूल और कॉलेज के वेकेशन आते वे दोनों गांव जाते, लेकिन अलग अलग बस मे, संध्या पहले अपनी पढ़ाई पूरी करके फीर अपने और आकाश के बारे मे अपने घरवालों से बात करना चाहती थी और आकाश को भी वही ठीक लगा इसलिए वो दोनों गांव जाके एकदूसरे से अकेले मिलते न थे और ना ही ज़्यादा बाते करते… आज आखिरी साल के वेकेशन की शुरुआत थी… जैसे उन दोनों ने तय किया वैसे आज दोनों एक साथ एक ही बस मे गांव के लिए रवाना हुए.. रास्ते मे दोनों ने खूब प्रेमभरी बाते की और संध्या ने आकाश को अपने परिवार वालों से उनके रिश्ते के बारे मे बात करने को कहा.. गांव छोटा होने की वजह से जैसे ही वे दोनों एक साथ बस से उतरे, लोग बातें करने के लिए जैसे तैयार ही थे.. लोग कुछ भी उल्टा सीधा बोले उससे पहले दोनों ने अपने परिवार वालों को सब कुछ बता दिया.. संध्या के मम्मी पापा ने संध्या को एक बार फीर सोचने को कहा.. लेकिन संध्या काफ़ी पक्की थी अपने इरादों मे, और उसको अपने प्यार पर पूरा यकीन था.. यहाँ आकाश ने अपने मम्मी पापा और भैया भाभी से बात की, पहले तो सब आग बबूला हो गए लेकिन जैसे उनको पता चला के वो लड़की संध्या है, उन्होंने खुश होके तुरंत ही हा बोल दी.. आकाश को विश्वास ही नहीं हुआ की उसके पेरेंट्स इतने जल्दी मान गए.. दूसरे दिन दोनों परिवारो ने मिलने का फैसला किया.. आकाश के घरवाले संध्या के घर पहुँच गए.. घर देख के उनकी आँखे चार हो गई थी.. बहार से तो कई बार देखा था लेकिन अंदर से उतना ही भव्य था संध्या का घर.. आकाश के पापा ने कहा,
“बेटा आकाश और बेटी संध्या अब तो हम सब आपके रिश्ते से खुश है देखो तभी तो सब मिले है आज… तुम दोनों जाओ थोड़ा साथ मे घूम के आओ…तब तक हम समधी समधन से बात करते है.. है ना !!”
आकाश और संध्या को तो जैसे हरी झंडी मिल गई थी.. वे खुश होके बहार गए…वापिस आए तब तक तो शादी की तारीख फिक्स हो गई थी…फीर तो शादी के काम शुरू हो गए और आकाश और संध्या का प्यार भी दिन ब दिन गहरा होता जा रहा था…
एकदिन संध्या के पापा कुछ कागज़ पर दस्तखत करके वकील को दे रहे थे… संध्या ने पापा से पूछा
“क्या हुआ पापा? किसके कागज़ है ये?
“वो कुछ नहीं बेटा वो हमारी ज़मीन पड़ी है उसे बेच रहा हु”
“लेकिन क्यों? “
“वो तेरी शादी मे ज़रूरत पड़ेगी ना “
“आपको तो पता है ना पापा मे आज की लड़की हु, इतने धूमधाम से शादी करके आपको क़र्ज़ नहीं करने दूंगी “
“अरे बेटा, क़र्ज़ कैसा? तेरा ही तो है सब..और तू आकाश के साथ और उसके परिवार वालों के साथ खुश रहे बस “
PNB
“वो तो मे वैसे भी रहूंगी पापा… आप चिंता ना करे “
शादी का दिन नज़दीक आ गया, कल शादी है और संध्याके पापा ने शहर मे भी ना हुई हो ऐसी शादी के सारे इंतेज़ाम किए थे और संध्या के लिए उसको पूछे बिना ना जाने कितने गहने, कपडे, घर की सारी चीज़े ले के उसका सामान ट्रक मे भर रहे थे… संध्या बहोत नाराज़ हुई पापा से इतना सारा सामान वो नहीं ले जाना चाहती थी…
“अरे बेटा ये तो सिर्फ हमारा प्यार है ” तभी उनको एक फ़ोन आया और वो जल्दी से अपने कमरे मे जाने लगे.. थोड़ा परेशान लग रहे थे… संध्या से रहा नहीं गया..वो भी पापा के पीछे पीछे कमरे के पास गई…
आज शादी का दिन है.. आकाश और उसके परिवार वाले पूरे तीनसौ लोगोकी बारात को लेके आ चुके थे.. यहाँ संध्या भी तैयार हो रही थी, लेकिन कुछ खोई खोई सी थी… जैसे ही पंडित जी ने संध्या को मंडप मे बुलाया, वो चल ने लगी… सामने आकाश, उसका प्यार और उसके परिवार वाले और नए होनेवाले रिश्ते थे और पीछे अपने मम्मी पापा… संध्या मंडप पे आके रूक गई..
” पापा मेरे इस होनेवाले रिश्तों और मेरे आकाश के प्रति प्यार की और मेरे पापा होने की वजह से आप ये सब कुछ हसते हसते सेह लेंगे, आगे भी सेहते रहेंगे लेकिन मे आपकी बेटी हु और कभी ऐसे लालची लोगो के आगे आपको नहीं झुकने दूंगी.. मैने सब सुन लिया है… ज़मीन, कपडे, गहने, गाड़ी, बंगला तो क्या एक फूटी कोड़ी भी आपकी मेहनत की कमाई की मे इनके घर नहीं जाने दूंगी…आकाश, इस लालच की खाई मे मैं अपने आप को नहीं झोंक सकती.. आप सब बारात लेके वापिस जा सकते है “
सही मे, शादी की पहली शर्त यही होनी चाहिए.. जहा दहेज है वहा रिश्तों मे प्यार नहीं बल्कि रिश्तों के सौदे होते है…
क्या कहना है आपका?
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धन्यवाद !!
शोभा काफ़ी बहिर्मुखी थी,अपने विचारों को लेकर पक्की भी और अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीने वाली… और वही सपना एक सेहमी सी, बहुत कम बात करने वाली, और सबका मन रखने वाली.. वो कभी अपने विचारों को जताती न थी,जो सब कहे वही ठीक, उसने अपनी इच्छाओ को कभी किसीको नहीं बताया.. पता नहीं इतनी अलग अलग होने के बावजूद भी वे दोनों पक्की सहेलियां थी, स्कूल के समय से..और उन दोनों का ससुराल भी एक ही शहर में था.. सपना मार्केट में सब्ज़ी ले रही थी, तभी सामने शोभा को देखा, “अरे, तुम यहाँ? कैसी हो? ” सपना शोभा को देखके खुश हो गई..” अच्छी हु, यहाँ मार्केट के पास डॉक्टर पुजा की हॉस्पिटल है तो उनको इनविटेशन देने आई थी, अगला नंबर तुम्हारा ही था सपना. में तुम्हे इस महिला दिन होने वाले हमारे महिला आयोग के फंक्शन में निमंत्रित करती हु”, शोभा बोली. सपना हाउस वाइफ होने की वजह से मन से खुदको छोटा ही समझती, और वो उस फंक्शन में जाने के लिए भी तैयार ना थी उसने जाने से मना कर दिया, “मे नहीं आ सकती, क्या करूँगी मे वहा पर, और मे तो किसीको जानती भी नहीं “, ” मुझे तो जानती हो ना ! बस इतना काफ़ी है ” शोभा बोली..” फीर भी अगर तुझे आने मे जिजक हो रही है तो बोल दे मे जीजू से बात कर लेती हु, और तेरे सास ससुर से भी”. सपना थोड़ा हिचकिचाई और बोली, “नहीं नहीं, मे बात कर लुंगी और कितने बजे जाना है वो बता देना, मे घर वालो की रसोई और काम जल्दी से निपटा कर आ जाउंगी ” शोभा को थोड़ा गुस्सा आया,” क्या एक टाइम का खाना तू नहीं पकाएगी तो नहीं चलेगा? कब तू रोज़ रोज़ बाहर जाती है, ऑनलाइन फ़ूड ऑर्डर कर देना या फीर वो पड़ोस की होटेल से मँगवाले, जो चाहिए वो मिलेगा”. “नहीं उन लोगो को बाहर का खाना पसंद नहीं है, कोई बात नहीं, में आजाऊंगी” इतना कहके सपना ने घर की तरफ चलना शुरू कर दिया, शोभा कुछ बोल ही ना पायी…
फंक्शन शुरू हो चूका था. सभी प्रोफेशन की महिलाये स्टेज पे थी, कोई बैंक मैनेजर तो कोई पुलिस अधिकारी, कोई कॉलेज की प्रोफेसर, तो कोई डॉक्टर… महिला दिवस के इस फंक्शन में शोभा भी मंच पे बिराजमान थी, वो महिलाओ के समान अधिकारों के लिए काम करती एक NGO की संस्थापक थी.. सभी महिलाओ को अपनी स्पीच देनी थी. शोभा बार बार दरवाजे की तरफ देख रही थी, सपना के आने का इंतजार कर रही थी. सपना के घर की हालत पता थी उसे, वैसे वो खास आती जाती नहीं थी सपना के वहा, लेकिन सिर्फ एक बार जाके ही शोभा को पता चल गया था की सपना के ससुराल वाले काफ़ी घमंडी, लालची और मतलब से ही बात करने वाले लोग थे, उनको सपना के मायके से आया कोई भी इंसान अच्छा नहीं लगता था, सपना इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद उनके सामने कुछ बोल ही नहीं पाती थी और शोभा उससे कुछ केहती तो वो “सब ठीक है “कह के हमेशा बात को टाल देती. शोभा से अपनी सहेली की ये हालत देखी नहीं जा रही थी, उसने सपना को खिलके मुस्कुराते हुए देखे मानो सालों हो चुके थे..सिर्फ सपना की वजह से शोभा चुप बैठी थी. लेकिन आज शोभा ने तय किया था के वो स्टेज पे सपना का नाम लिए बगैर, उसके जैसी महिलाओ को प्रोत्साहित करनेवाली स्पीच देगी. अभी शोभा की ही बारी थी महिला दिन के विषय में बात करने की, तभी हॉल मे सपना दाखिल हुई, धीमी चाल से अंदर आई, देर से आई थी और कार्यक्रम में किसीको खलेल ना पहोचे इसलिए वो नज़दीक की ही सीट पे बैठ गई.. पूरा हॉल महिलाओ से खचाखच भरा था.. सपना अपनी शादी के बाद अकेले किसी प्रोग्राम में पहली बार बहार गई थी. शोभा जैसे ही खड़ी हुई, सब तालिया बजा ने लगे.. शोभा ने सभी महिलाओ को एक बार अपने खुदके लिए तालिया बजाने को कहा, और बोलने शुरुआत की, “में सभी महिलाओ को अपने लिए मनाये जाने वाले इस दिन की बधाई देती हु. महिला, औरत, लड़की जो भी कह लीजिए, सबसे पहले हमें भगवान के दिए इस अवतार को ख़ुशी से accept करना चाहिए. क्योंकि हम मै ही है वो ताकत,वो जज़्बा, वो हिम्मत, वो धैर्य और वो सहनशीलता जो पथ्थरो को भी पिग्ला देती है… और उसीकी वजह से जीवन में आए किसी भी बदलाव को हम सहजता से अपना लेते है और उसमे ढल भी जाती है.. फीर वो छोटी बच्ची से जवान लड़की का बदलाव हो, लड़की से लेके एक शादी शुदा औरत का बदलाव हो या फीर औरत से माँ बनने का बदलाव.. इन बदलावों के दरमियान कई सारे अलग अलग रिश्ते भी निभाना हम खूब जानती है.. बस उसी बदलाव भरी हमारी जिंदगी में हम खुदको ही भूल जाती है, अपनी इच्छाओ को परिवार के लिए, कभी बच्चों के लिए मार देती है , खुदको ही ना मिलने का, अपनी अंदर ही कैद उस आशा के पंछी को आज़ाद ना करने का मन बना लेती है.. क्यों??? क्यों ऐसा करती है हम, इतनी ज़िम्मेदारीया, इतने रिश्ते, अपनी जॉब, बच्चे सब सँभालना इन सब का गर्व होना चाहिए हमें..
में महिला और पुरुष की बराबरी की बात नहीं करुँगी, हमें जीवन को सारी ज़िम्मेदारीयों के बोझ से आगे भी सोचना चाहिए.. में नहीं केहती के चूल्हा चौका मत करो, अपने घरवालों का ध्यान मत रखो.. सब करो लेकिन सबको साथ लेकर करो..अपनी इच्छाओ को ऐसे ही बुझने ना दो..समय निकालो उस महान हस्ती से मिलने के लिए जो तुम्हारे अंदर है, अपनी प्रतिभा को कम मत समझो, घर का काम manage करना वो भी किसी कंपनी के मैनेजर से कम नहीं है, वो तो सिर्फ आठ घंटे देता है, आप तो पूरे दिन रात देती है…
घर के लोगो से सपोर्ट लो,पति,देवर, ननद, और थोड़ा सा खुदका काम सास ससुर कर लेंगे तो कितनी आसानी होंगी ना! उस बचे हुए समय को आप अपने परिवार के साथ ख़ुशी के पल बिता ने के लिए या अपने शोख पुरे करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.. और हम 21st century की लड़किया है, बहुएँ है, बेटियां है, और माँए भी.. अपने माँता पिता को भी यही समजाये, और अपने बच्चों को भी, के कैसे खुदके काम खुद करने है.. उसकी ट्रेनिंग दीजिए… मज़े से उनको घर के कामो में involve कीजिए.. फीर देखिए, ना तो समय की कमी होंगी, ना आत्म विश्वास की और ना ही वो अंदर का पंछी पिंजरे में रहेगा.. वो पंछी अपनी आशाओ के आसमान में आज़ाद होके उड़ेगा और दुनिया देखेगी आपको, और आप खुद भी गर्व करेगी अपने आप पे ” कहते हुए शोभा ने अपनी स्पीच पूरी की.. और हॉल की सारी महिलाए खड़ी होकर तालियां बजाने लगी… सपना भी जैसे खो ही गई थी उसकी बातो में… जैसे ही शोभा सब का अभिवादन ले रही थी, सपना उसके पास जा पहोची और सबके बिच उसको गले लगा लिया, “thank you शोभा ” बोल कर बाहर निकलने लगी…. इधर शोभा भी बहोत खुश थी,उसने जैसा सोचा वैसा ही हुआ…
आज हॉल के बाहर निकलती हुई सपना कुछ ओर ही थी.. उसने भी अपने जीवन को ख़ुशी से बिताने का दृढ़ निश्चय किया और आत्म विश्वास से भरी हुई सपना ने पहला कदम रखा, अपना जीवन सही तरीके से जीने लिए.. …
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